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बस्ती का ‘खूनी’ अस्पताल: क्या सिर्फ बर्खास्तगी से मिटेगा मासूम की मौत का दाग?

सफेद वर्दी में 'यमदूत': नर्स की लापरवाही ने ली मासूम की जान, बर्खास्तगी तो बस शुरुआत है!

अजीत मिश्रा (खोजी)

नरपिशाच बनी ‘सिस्टम’ की लापरवाही: कुदरहा में मानवता शर्मसार, नवजात का सिर काट दिया या मसीहा बन गए यमदूत?

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • डिप्टी सीएम के रडार पर बस्ती: कुदरहा कांड में नर्स की बर्खास्तगी की संस्तुति, मचा हड़कंप।
  • साजिश या लापरवाही? घटना छुपाने के लिए नर्स को किया था ‘संबद्ध’, अब गिरेगी बर्खास्तगी की गाज।
  • जिला स्वास्थ्य समिति की बड़ी कार्रवाई: नवजात की मौत मामले में आरोपी स्टाफ नर्स कुसुम सिंह की सेवा समाप्त।
  • साहब! मेरे बच्चे का कातिल कौन? कुदरहा सीएचसी के उस खौफनाक मंजर की दास्तां।
  • मौत का ‘नर्सिंग’ होम: जहाँ जीवन मिलना था, वहां मिली रूह कंपा देने वाली मौत।
  • बस्ती स्वास्थ्य विभाग पर कलंक: लापरवाही की इंतहा, अधकचरे ज्ञान ने ली नवजात की जान।

बस्ती। जनपद के कुदरहा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) से मानवता को झकझोर देने वाली जो तस्वीर सामने आई है, उसने स्वास्थ्य विभाग के ‘सब चंगा है’ के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। क्या कोई सोच सकता है कि जीवन देने वाली गोद ही मौत का कत्लखाना बन जाएगी? कुदरहा सीएचसी में प्रसव के दौरान जो हुआ, वह महज़ ‘लापरवाही’ नहीं, बल्कि सफेदपोश वर्दी में किया गया एक जघन्य अपराध है।

ममता की कोख और सिस्टम का क्रूर प्रहार

मुरादपुर गांव की प्रेमा देवी जब प्रसव पीड़ा के साथ अस्पताल पहुंची थीं, तो उन्हें उम्मीद थी कि वहां उन्हें जीवनदान मिलेगा। लेकिन वहां तैनात ‘मसीहा’ रूपी स्टाफ नर्स कुसुम सिंह ने जो किया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। बिना किसी विशेषज्ञ डॉक्टर की मौजूदगी के, महज़ अपनी ज़िद और अधकचरे ज्ञान के दम पर जबरन प्रसव (Forced Delivery) कराने का जो दुस्साहस किया गया, उसकी कीमत एक मासूम को अपनी जान देकर और एक माँ को उम्र भर के सदमे के साथ चुकानी पड़ी।

सवाल उठता है: क्या एक स्टाफ नर्स को इतना अधिकार है कि वह एक गर्भवती महिला के साथ जानवरों जैसा सुलूक करे? नवजात का धड़ बाहर आ गया और सिर अंदर फंसा रह गया—यह दृश्य ही रूह कंपा देने वाला है। क्या स्वास्थ्य विभाग में संवेदनशीलता पूरी तरह मर चुकी है?

पाप छुपाने की कोशिश और ‘रेफर’ का खेल

घटना के बाद जो हुआ, वह और भी शर्मनाक था। जब अपनी गलती का अहसास हुआ, तो सिस्टम ने उपचार के बजाय ‘साक्ष्य मिटाने’ और ‘पल्ला झाड़ने’ पर ज़ोर दिया। आनन-फानन में महिला को निजी अस्पताल और फिर मेडिकल कॉलेज भेजा गया। अपनी गर्दन बचाने के लिए दोषी स्टाफ नर्स को हटाकर टीबी अस्पताल में संबद्ध करना क्या न्याय है? क्या एक नवजात की मौत की कीमत सिर्फ एक ‘ट्रांसफर’ है?

सिर्फ बर्खास्तगी काफी नहीं, सलाखों के पीछे हो जगह!

हालांकि, अब जिला स्वास्थ्य समिति ने स्टाफ नर्स कुसुम सिंह की बर्खास्तगी की संस्तुति कर दी है, लेकिन क्या इतना काफी है?

डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के कड़े रुख के बाद विभाग जागा तो है, पर सवाल यह है कि ऐसे ‘अनपढ़’ और ‘क्रूर’ व्यवहार वाले कर्मियों को संवेदनशील पदों पर बिठाया ही क्यों जाता है?

बस्ती का स्वास्थ्य महकमा आखिर कब तक जांच और फाइलों के पीछे छिपता रहेगा?

निष्कर्ष: जनता जवाब मांगती है!

यह घटना बस्ती जिले के माथे पर एक काला कलंक है। जब तक ऐसी लापरवाह नर्सों और अधिकारियों पर गैर-इरादतन हत्या (धारा 304) के तहत मुक़दमा दर्ज कर उन्हें जेल नहीं भेजा जाता, तब तक ‘बर्खास्तगी’ की यह कार्रवाई महज़ एक आईवॉश (छलावा) लगेगी।

बस्ती मंडल के स्वास्थ्य जिम्मेदारों! याद रखिये, आप तनख्वाह जीवन बचाने के लिए लेते हैं, मासूमों की गर्दनें काटने के लिए नहीं। आज कुदरहा की उस माँ की चीखें पूरे बस्ती मंडल के स्वास्थ्य ढांचे से जवाब मांग रही हैं।

बस्ती की आवाज़, न्याय की आस।

ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती।

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